अनोखा दंड हिंदी कहानी।अनोखी कहानी।

अनोखा दंड। कहानियां। मेरा एक अनोखा सपना निबंध हिंदी

राज नगर के राजा थे राम सिंह और विजय नगर के राजा थे विजय सिंह दोनों में कई बार लड़ाइयां हुई कवि एक जीता था कभी दूसरा एक बार विजय सिंह की करारी हार हुई राम सिंह की जीत में रामनगर के कुशल कारीगरों का हाथ था उन्होंने राज्य की सीमा पर जगह-जगह संकेत देने वाले खंभे खड़े कर दिए थे उनका सीधा संबंध राजकुमारी के महल में था।

अनोखा दंड। कहानियां

महल में चांदी की घंटियां लटक रही थी आक्रमण की संख्या होते ही सीमा पर स्थित सैनिक खंभों से संकेत भेज देते थे और राजकुमारी के महल की घंटियां बजने लग जाती थी राज्य की सारी सेना सीमा की ओर दौड़ पड़ती थी इस प्रकार विजय सिंह को रामनगर पर आक्रमण का मौका ही ना मिलता था।

एक बार विजय सिंह की करारी हार हुई उसने अपने अपमान का बदला लेना चाहा उसने सोचा यदि रामनगर की राजकुमारी सोनल के महल की घटिया किसी तरह उतरवा ली जाए तो काम बन सकता है सीमा की खबर वहां पहुंच नहीं पाएगी और तब मेरा आक्रमण सफल हो जाएगा।

अब है इस चिंता में डूब गया कि इस काम को कौन करेगा। विजय सिंह के बेटे संजय ने पिता को चिंता में डूबे देखा तो कारण पूछा जब विजय सिंह ने सारी बात बताई तो संजय ने कहा पिताजी आप चिंता ना करें यह काम मैं कर लूंगा।

संजय वहां से भेष बदलकर रामनगर चला गया वह वीणा बजाने में बहुत कुछ था एक दिन वह दरबार में जा पहुंचा उसने वीणा बजाई उसे सुनकर राजा तथा दरबारी मुग्ध हो गए पर्दे के पीछे बैठी रानी ने तथा राजकुमारी सोनल ने भी वीणा सुनी।

सोनल के कहने पर राम सिंह ने संजय को वीणा सिखाने पर नियुक्त कर लिया अब संजय हर रोज महल में जाकर राजकुमारी सोनल को भी वीणा सिखाने लगा।

राजकुमारी नमन लगाकर वीणा बजाना सीखा समय के साथ सोनल वीणा बजाने में प्रवीण हो गई 1 दिन संजय ने कहा अब मैं तुम्हें जीना सिखा चुका अब मैं अपने घर जाऊंगा तुम मुझे दक्षिणा दो।

सोनल ने कहा मांगिए आप जो मांगेंगे मैं दूंगी अवसर पाकर संजय बोला मुझे यह घंटियां बहुत प्रिय है मुझे यही दे दो।

लाचार होकर सोनल ने घंटियां दे दी अब क्या था राजा विजय सिंह ने उसी रात रामनगर पर हमला कर दिया खंभों से संकेत भेजे गए परंतु घंटियां ना होने से संकेत महलों तक ना पहुंचे। विजय सिंह की सेना महलों तक आ पहुंची तब रामनगर के सैनिकों ने उनका मुकाबला किया। पर अब क्या हो सकता था बहुत देर हो चुकी थी रामनगर वाले हार गए।

तभी राजाराम सिंह क्रोध से कांपते हुए महल में आकर बोले सोनल महल की घंटियां कहां है?

सोनल की आंखों से आंसू आ गए उससे कुछ उत्तर देते ना बन पड़ा पिता के हाथ में नंगी तलवार देखकर उसने सिर झुका लिया फिर कांपती आवाज में गोली पिताजी यह सब मेरे ही कारण हुआ है मैंने आपसे आज्ञा लिए बिना ही घंटियां संजय को दे दी।

सोचा था कि नहीं घंटियां तुरंत लगवा दूंगी पर मौका ही ना मिल सका आप मुझे इस अपराध का दंड दें क्रोध में अंधे होकर रामसिंह बेटी की गर्दन पर वार करने ही वाले थे कि पीछे से किसी ने उनका हाथ पकड़ लिया।

राम सिंह ने घूम कर देखा तो विजय सिंह खड़े मुस्कुरा रहे थे। राजाराम सिंह ने विस्मित होकर उन्हें देखा विजय सिंह कहने लगे राजा राम सिंह संजय मेरा बेटा है उसने मुझे सब कुछ बता दिया है। मैं सोनल को अनोखा दंड दूंगा।

सोनल जैसी बहू पाकर मैं धन्य हो जाऊंगा। सोनल और संजय को विवाह बंधन में बांध दो अब तक हम एक दूसरे के शत्रु थे मैं सदा तुम को पराजित करने की युक्ति सोचता रहता था। पर इस नए संबंध से हम एक दूसरे के मित्र हो जाएंगे। 

अब विजय नगर तथा रामनगर प्रेम के सूत्र में बंध जाएंगे ना रोज रोज लड़ाई होगी और ना दोनों और की प्रजा दुखी होगी इतना कहकर विजय सिंह ने बाहें फैला दी रामसिंह भी आगे बढ़े उन्होंने विजय सिंह की बात मान ली बरसों के दुश्मन आज दोस्ती के बंधन में बंध गए थे।

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