आपसी झगड़े में तीसरा पंच – शिक्षाप्रद कहानी

नैतिक शिक्षाप्रद कहानियाँ

पुत्रक नाम का एक व्यक्ति जंगल में घूम रहा था। घूमते-घूमते उसने एक स्थान पर दो पुरुषों को लड़ते हुए देखा। पुत्रक ने उनसे लड़ने का कारण पूछा तो वे बोले-“हम मायासुर के पुत्र हैं ओर. अपने पिता की सम्पत्ति के लिए लड॒ रहे हैं।

जो हममें से विजयी होगा, वही उस सम्पत्ति का स्वामी बनेगा।

पुत्रक ने कहा-“तुम एक दूसरे को मरने-मारने पर लगे हो,

इससे अच्छा तो तुम उस सम्पत्ति को आधा-आधा बाँट लो। उन्होंने कहा कि तीन वस्तुएँ हैं; हम हें दो। जिसे मैं चाहता हूँ उसे ही यह भी चाहता है। अब तो न्याय विजयी होने पर ही होगा।

पुत्रक ने पूछा, “ऐसी वे कौन-सी वस्तुएँ हें जिसके लिए तुम लड॒ रहे हो?”

मायासुरों ने संकेत करते हुए कहा, “एक जोडां खडाऊँ, एक डण्डा और एक कटोरी। यही वह सम्पत्ति है।”

पुत्रक ने कहा, “इतनी साधारण वस्तुओं के लिए एक-दूसरे के प्राण लेना उचित नहीं है।”

छोटी व शिक्षाप्रद कहानी

तब मायासुरों के पुत्रों ने कहा, “यह साधारण सम्पत्ति नहीं है। इन खडाऊँ को पहनकर मनुष्य आकाश में गमन कर सकता है। इस डण्डे पर जो कुछ लिखा जाएगा वही सत्य हो जाएगा। और जिस वस्तु की इच्छा हो वह इस कटोरे में उपस्थित है जाएगी। अब आप ही बताइए कि क्‍या ये साधारण वस्तुए हैं।

पुत्रक ने कहा, “यदि ऐसी बात हो तो मैं सत्य-असत्य का परीक्षण करना चाहता हँ।” मायासुर के पुत्रों ने इसकी अनुमति दे दी। पुत्रक ने एक-एक करके तीनों वस्तुओं का परीक्षण किया।
जो सत्य थी।

पुत्रक ने कहा, “मैं तुम्हें न्याय की विधि बताता हूँ। जो दौड़ में तुम दोनों में से आगे निकलेगा। उसी की विजय होगी और इन वस्तुओं का स्वामी भी वही होगा। इस प्रकार दोनों मायासुरों के पुत्र दौड़ने लगे।

दोनों दौड़ते हुए कुछ ही दूर गए थे कि पुत्रक ने खड़ाऊँ को पहना ओर कटोरी व डण्डे को हाथ में लेकर आकाश के रास्ते चल दिया। उनके समीप जाकर उनसे बोले, “तुम दोनों दोडते रहो, में तो चला।

इस प्रकार पुत्रक ने उनको गलती का आभास कराया कि, “यदि तुम दोनों की आपसी फूट न होती तो यह असाधारण वस्तुएँ मुझे कदापि न मिलती।”

इस प्रकार मायासुर के दोनों पुत्र रोने व पछताने लगे और खाली हाथ वापिस घर लोट आए।

शिक्षा-महर्षि दयानन्द के शब्दों में, “जब आपस में भाई- भाई लड॒ते हैं तो तीसरा आकर पंच बन बैठता हे” राजा लोग आपस में लड॒ते रहे। परिणामस्वरूप मुसलमान व अंग्रेज हमारे शासक बन गए। आपसी फूट से नाश निश्चित है। यही दशा हमारे समाज व राष्ट्र और परिवार की हे।

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