बुद्धि बड़ी या विद्या Hindi Kahani

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बुद्धि की कहानी। बुद्धि ही बल है पर निबंध।बुद्धि ही श्रेष्ठ बल है

बुद्धि बड़ी या विद्या

चार मित्र थे चारों काशी पढ़ने गए एक व्याकरण पढ़ने लगा दूसरा ज्योतिष तीसरा वेधक और चौथा न्याय, खूब पढ़ लिखकर कई वर्ष बाद में अपने गांव की ओर वापस चल पड़े रास्ते में एक नजर आया दोपहर का समय था धूप तेज थी उन्होंने आराम करने का निश्चय किया वे चारों एक धर्मशाला में ठहर गए।

वहां का राजा विद्वानों का बहुत सम्मान करता था उसने उन चारों के लिए चावल दाल आदि तथा कुछ रुपए नगद भेज दिए नगद इसलिए कि वे और साग सब्जी आदि मोर ले सकें।

मित्रों के पास एक घोड़ी थी उस पर उन्होंने अपने बिस्तर पुस्तकें तथा पूजा पाठ का सामान लाद रखा था। चारों मित्रों ने तय कर लिया कि अपने-अपने अलग-अलग काम बांट लेने चाहिए।

बुद्धि ही बल है पर कहानी

ज्योतिषी ने कहा मैं घोड़ी चढ़ा लाऊंगा यदि हो भी गई तो ज्योतिष विद्या से जान लूंगा कि कहां गई है?

वैध बोला साग सब्जी में खरीद लाऊंगा क्योंकि मैं उनके गुण दोष जानता हूं।

न्याय वाले ने कहा जी मैं खरीद लाऊंगा।

व्याकरण के विद्वान ने कहा रसोई में बनाऊंगा ताकि सबको भरपेट खाना मिले।

न्याय वाले ने बाजार से खरीदा चलते चलते वह सोचने लगा बर्तन के सहारे गीतिका है या घी के सहारे बर्तन? जब कुछ कहना कर पाया तो उसने बर्तन उल्टा करके देखा गर्मी से घी पिंगला हुआ था बर्तन के उल्टा करते ही वैसा राखी नीचे गिर गया।

उधर वैद्य जी सब्जी बाजार पहुंचे तोरी भिंडी करेले प्रबल बैंगन कद्दू पालक मेथी आदि बिक रहे थे। उन्होंने कोई ना कोई दोस्त हर एक सब्जी ना पाया वह बिना कुछ खरीदे वापस लौट पड़े।

रास्ते में एक स्त्री नीम की पत्तियां बेच रही थी वह हरी थी समझती और सब प्रकार से ठीक थी वह जी ने जितने पैसे थे सर देकर नीम की पत्तियां खरीदी वह खुश थे कि नीम में एक भी दोष नहीं।

व्याकरण के पंडित ने चावल दाल मिलाकर पतीली चूल्हे पर चढ़ा दी जब खिचड़ी पकने लगी तो , खदबद खदबद , आवाज होने लगी। उन्होंने अशुध है अशुध है सत्यनवद सत्यनवद, होना चाहिए ऐसा कहते हुए कच्ची से पतीली को पीटना शुरू कर दिया।

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बुद्धि का बल कहानी

जब फिर वही आवाज आती रही तो व्याकरण के पंडित सह ना सके उन्होंने पतीली ले जाकर कूड़े में उलट दी जब आवाज बंद हो गई तो पंडित जी को चैन पड़ी। 

उधर ज्योतिषी जी घोड़ी चराने ने ले गए थे। पीतल की शीतल छाया देखकर भी आराम करने लगे झट उन्हें नींद आ गई। घोड़ी चढ़ती चढ़ती एक पहाड़ी पर चढ़ गई थोड़ी देर बाद वह दूसरी तरफ उतर गई ज्योतिषी जी की नींद खुली तो घोड़ी वहां ना थी हंसकर बोले जाएगी कहां अभी ज्योतिष विद्या से पता लगा लेता हूं।

उन्होंने ज्योतिष विद्या से जान लिया कि घोड़ी पहाड़ी पर चढ़कर नीचे उतर गई है उन्होंने सोचा जो घड़ी इतनी देर में पहाड़ी पर चढ़कर दूसरी तरफ उतर गई वह ना जाने अब कितनी दूर चली गई होगी। अब उसका पीछा करना बेकार है ऐसा सोचकर वे धर्मशाला में लौट आए।

बुद्धि ही बल है पर निबंध

चारों मित्रों ने एक दूसरे को आपबीती सुनाई फिर भी बिना भोजन किए ही संतोष कर के सो गए।

थोड़ी देर में राजा के सेवक ने आकर उन्हें जगाया और कहा चलो राजा ने दरबार में बुलाया है। सेवक नहीं है अभी देखा की घोड़ी विवाह नहीं है खिचड़ी की पतीली उल्टी पड़ी है भोजन का नामोनिशान वहां नहीं केवल नीम की पत्तियां पड़ी है।

तो उसने जाकर राजा को सारा हाल सुनाया तब राजा ने भोजन बनवा कर धर्मशाला में भेजा भोजन करके भी राज दरबार में गए।

राजा ने उनको रे विद्वानों को समझाते हुए कहा विद्या का यह अर्थ नहीं कि तुम बुद्धि का प्रयोग करना बंद कर दो। विद्या बड़ी है परंतु बुद्धि उससे भी बड़ी है। जो काम करो भरी प्रकार बुद्धि से सोच समझकर करो। यदि सोचे विचारे बिना काम किया जाएगा तो कभी सफलता नहीं मिल सकती।

बुद्धि बल कहानी

इसलिए पुस्तक के ज्ञान के साथ-साथ बुद्धि का प्रयोग करना भी आवश्यक है।

यह सुनकर चारों मित्रों की आंखें खुल गई।

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