पर्वतारोही आहलुवालिया की आत्मा कहानी

मेरा बचपन शिमला में बीता मेरे पिताजी इंजीनियर थे मेरे दादाजी भारतीय सेना में कैप्टन के पद पर रह चुके थे।

मेरे परदादा घुड़सवार सेना में थे मेरे बचपन के दिनों में वे जीवित हैं लेकिन रिटायर हो चुके थे उन्हें वीरता के कारण कई पुरस्कार मिले थे।

पहाड़ों से मेरा प्रेम शिमला से ही प्रारंभ हुआ वहां खेल खेल में हमें छोटी-छोटी पहाड़ियों पर चढ़ाई का मौका मिलता रहता था।

कुछ दिनों बाद मेरे दादाजी रिटायर होकर लाहौर जा बसे लेकिन सन् 1947 में जब हिंदुस्तान का बटवारा हो गया तो वे देहरादून चले आए जहां उन दिनों मेरे पिताजी नियुक्त थे।

देहरादून से मसूरी बहुत करीब है परंतु आधे रास्ते के बाद खतरों के लिए बनाया गया रास्ता काफी कठिन चढ़ाई से होकर गुजरता है देहरादून में रहते समय पहाड़ियों पर शोखियां ढंग से चढ़ने के मौके मुझे मिलते रहे।

कुछ दिनों बाद मेरे पिताजी का तबादला कोलकाता हो गया इंटरमीडिएट की परीक्षा के बाद में भी कोलकाता चला गया मुझे देहरादून की राष्ट्रीय मिलिट्री एकेडमी में चुन लिया गया वहां 2 वर्ष मैंने सैनिक का काम सीखा यहां का जीवन बहुत कठोर था।

सन 1958 में इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल इंजीनियर कोर में नियुक्त कर मुझे सिकंदराबाद भेज दिया गया सिकंदराबाद में छोटी-मोटी पहाड़िया है मुझे शौकिया तौर पर उनकी ऊंचाई हत्या करने का मौका मिलता रहा एक बार ब्रिगेडियर ज्ञान सिंह वहां आए।

वह दार्जिलिंग में हिमालय माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट भारतीय पर्वतारोहण संस्थान के प्रिंसिपल थे। उन्होंने पर्वतारोहण पर भाषण दिया और एक फिल्म भी दिखलाई मैंने उनसे पूछा कि क्या मैं दार्जिलिंग के संस्थान में पर्वतारोहण सीखने के लिए दाखिला ले सकता हूं उन्होंने मुझे उत्साह दिया और छपे हुए आवेदन पत्र भी दिए।

सिकंदराबाद में 1 साल की ट्रेनिंग के बाद मुझे जम्मू कश्मीर में एक वर्कशॉप में भेज दिया गया वहां पर्वतों की छोटी-मोटी चढ़ाई यूं के मौके मिलते ही रहते थे।

सन 1961 में मुझे पर्वतारोहण के लिए दार्जिलिंग में दाखिला मिल गया हमें पहाड़ों पर चढ़ाई करने के ढंग सिखाए गए जरूरी सामान से भी परिचित कराया गया फिर हमारी पर्वत यात्रा शुरू हुई यह कष्ट कर और थका देने वाली थी तीसरे दिन मेरे घुटनों में पीड़ा होने लगी चढ़ाई बहुत ही कठिन थी मैं दल में पीछे रह गया तभी उधर से एक जीत गुजरी उस पर एवरेस्ट विजेता 3 सिंह बैठे हुए थे।

उन्होंने मुझे वापस चले जाने को कहा परंतु मैंने इनकार कर दिया मेरे दृढ़ निश्चय से उन्हें बड़ी खुशी हुई उन्होंने मुझे एक मरहम दी उससे मेरे घुटनों की पीड़ा दूर हो गई मैं जल्दी-जल्दी चलकर साथियों के साथ जा मिला इसके बाद मैंने ऊंचे दर्जे का पर्वतारोहण कोर्स पूरा किया इसका लक्ष्य 19000 फुट की ऊंचाई तक पहुंचना था मुझे इसमें सफलता मिली तब 1962 में होने वाले पर्वतारोहण अभियान में मेरा भी नाम लिख दिया गया।

कुछ समय बाद सेना का एक पर्वतारोहण चल करीब 20000 फुट ऊंची गुप्तांग चोटी पर चढ़ने के लिए चुना गया इनमें मेरा भी नाम था।

मैं कोकथांग की चोटी पर चढ़ने में सफल रहा अतः मेरा नाम 1965 में एवरेस्ट की चढ़ाई पर जाने वाले दल में लिखा गया।

22 फरवरी को हमारा एवरेस्ट अभियान दल दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर पहुंचा मित्रों संबंधियों तथा शुभचिंतकों की शुभकामनाओं के साथ हमारी गाड़ी रात के 8:45 बजे चल बड़ी मार्ग में सभी स्टेशनों पर स्नेह भरी भीड़ ने हमारा स्वागत किया।

जयनगर में हमारा भारी सम्मान किया गया 26 फरवरी को हम नेपाल की और बड़े हमारे साथ 800 बोझा ढोने वाले और पुरुष मजदूर थे वे प्रारंभिक शिविर बेस कैंप तक हमारा सामान ले जाने वाले थे इनके सिवा हमारे साथ 80 शेरपा भी थे शेरपा ओं का काम था मार्ग दिखला ना इनके मुखिया थे आंगतसे रिंग

उप मुखिया थे फोर जी इन दोनों से मिलकर मुझे बड़ी खुशी हुई पर्वतारोहण का उनका रिकॉर्ड प्रथम श्रेणी का था।

हमारे एवरेस्ट अभियान दल के नेता थे कमांडर m.s. कोहली और उपनेता थे मेजर कुमार।

5 दिन की यात्रा के बाद हम सुन कोशी नामक नदी के किनारे पहुंचे हमने लकड़ी के पत्रों जैसी नाव से इसे पार किया इसी तरह कई नदियां हमने पारकी कभी पेड़ के तने से बनाए पुल से गुजर कर और कई बार तैयार कर भी हमें छोटी मोटी नदिया पार करनी पड़ी।

छठे दिन हम ओखलढुंगा पहुंचे यह ब्रेस्ट के मार्ग में सबसे बड़ा गांव है यहां से चलकर हम एवरेस्ट के दक्षिण में स्थित दूध कोसी नदी पर पहुंचे। यह समुद्र तल से 10000 फीट ऊंची है वहां अपना कैंप शिविर कायम करके हम अगले दिन थांगो चे मठ पर पहुंचे यह रॉन्ग बुक के बाद बौद्धों का सबसे बड़ा मठ है।

यहां से हमारा विचार 3 दिनों में बैठकर खुंबू हिम प्रपात की ओर बढ़ने का था।

थांगो चेसे यात्रा आरंभ करने के बाद पांचवें दिन 18 मार्च को 2:10 एम जा घाटी से होकर प्रस्थान शिविर बेस कैंप पहुंच गए। 17800 फुट की ऊंचाई पर खुंबु ग्लेशियर के नीचे हमारा प्रस्थान शिविर बेस कैंप था यह स्थान हेम प्रपात और बर्फ की चट्टानों के फिसल कर गिरते रहने से शोर भरा था।

3 अप्रैल को हम में से सात जनों ने दूसरा शिविर बनाने के लिए चढ़ाई शुरू कर दी शाम तक 21300 फुट की ऊंचाई पर हमारा दूसरा शिविर भी तैयार हो गया।

3 दिन बाद 22300 फुट की ऊंचाई पर तीसरा शिविर बन गया चौथा शिविर तैयार करना बहुत कठिन था 4 दिन बाद ऑक्सीजन की सहायता से रहा तय की जा सकी अब हम 25000 फीट की ऊंचाई पर चौथे शिविर में थे।

14 अप्रैल तक दल के एक सदस्य चीमा शेरपा और मैं दक्षिण कॉल पर पांचवा शिविर बना रहे थे 29 अप्रैल को मालूम पड़ा कि आगे की यात्रा खराब मौसम के कारण खतरनाक है। अतः हमें प्रस्थान शिविर लौटना पड़ा 22 दिन प्रस्थान शिविर में रुकने के बाद हमने देखा बादल छट गए हैं बर्फानी तूफान रुक गया है तब हमारा अभियान दल आगे बढ़ा।

20 मई को प्रातः 5:00 बजे गोम्बू और चीमा यह दोनों अभियान के अंतिम चरण के लिए चले दोपहर से ठीक पहले हमारे अभियान दल की एक टोली एवरेस्ट शिखर पर पहुंची और 24 मई को वोहरा और अंग कमी भी एवरेस्ट शिखर पर जा पहुंचे।

इस तरह अब तक हमारे दल के छह सदस्य एवरेस्ट शिखर पर विजय पा चुके थे एकाएक मौसम खराब हो गया वह टोली रुक गई जिसमें मैं भी था 25 मई को हमें खबर मिली की बर्फ की चट्टान फिसलने से हमारा तीसरा शिविर नष्ट हो गया है साथ ही हमारा ऑक्सीजन सिलेंडर भी गुम हो गया है।

उसे खोजने के लिए हम 6 घंटे लगातार पर खोजते रहे आखिर मेरी कुल्हाड़ी का सर्फर्स किसी कठोर चीज से हुआ और वही हमारा ऑक्सीजन सिलेंडर था।

अब हमारी अंतिम चढ़ाई शुरू हुई 27000 फुट की ऊंचाई पर शेरपा रुक गए अब पढ़ने वालों में हम चार थे फूड और जी और मैं आगे थे और पीछे थे रावत और बोगी अंतिम शिविर पर बोगी भी रुक गया हवाएं बहुत तेज चल रही थी यदि जरा सा पैर फिसलता तो हम 8000 फुट नीचे खाई में जागृति जहां हमारी हड्डी पसली का भी पता ना लगता धुंध के कारण हम एक दूसरे को देख भी नहीं सकते थे केवल एक ही रस्सी के सहारे चलने के कारण हम उसी के संकेत से एक दूसरे का हाल जान लेते थे।

अंत में हम बर्फ के एक छोटे से प्लेटफार्म पर जा पहुंचे हमारा हर कदम दर्द और सांस लेने की कठिनाई से भरा हुआ था हम निराश होते जा रहे थे आगे बढ़ने पर हमने पाया कि अब ऊपर बढ़ने के लिए कोई जगह नहीं बची थी हम एवरेस्ट की चोटी पर थे।

मोहन प्रार्थना से भरा में घुटनों के बल बैठ गया फिर मैंने गुरु नानक की एक तस्वीर और मां की दी हुई एक माला एवरेस्ट की चोटी पर बर्फ में दबा दी।

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