बड़ों का अनुकरण अनुसरण hindi naitik kahaniyan

Moral Stories In Hindi

एक धनी परिवार में बहू आई तो सास ने उसे पूरा मकान दिखाया अन्त में वे दोनों दहलीज में पहुँँचे। वहाँ एक पुरानी खाट पर मैली चादर बिछी थी और उस पर एक बुढिया अत्यन्त गन्दे
कपडे बैठी हुई थी। बहू ने पूछा-“माताजी ये कौन है।”

सेठानी ने बताया-यह मेरी सास और तेरी ददिया सास हे। परन्तु है बड़ी दुष्ट। सदैव गन्दी रहती है। इसीलिए इसे सबसे अलग यहाँ रखा है। मिट्टी के बर्तनों में खाना दिया जाता है।

कोई इससे बात नहीं करता। यह: अकेली पड़ी रहती ह। सब कुछ सुनने के बाद बहु ने कहा- अच्छा माता जी कल से दादी माँ का भोजन में लाया करुँगी।

सास सहमत हो गई। बहू मिट्टी के बर्तनों में खाना खिलाने के बाद उन्हें धोकर रख देती । पहले फेंक दिए जात थे इस प्रकार रोज के बर्तन इकटूठे होते गए। बरामदे में ढेर लगा गया। एक दिन बहू की सास उधर से निकली तो बहू से पूछा ये बर्तनो का ढेर यहाँ किसने लगाया है । में तो बर्तन फिकवा दिया करती थी।

बहू ने उत्तर दिया-मॉजी; यह मैंने किया हैं।

सास-क्यों ?

बहू- क्योंकि जब इनकी आवश्यकता होगी तो काम में ले लेंगे।

सास-अरे बहू! ये भला क्‍या काम आएंगे?

बह-दादी माँ के बाद जब आप बूढ़ी होंगी तो ये ही बर्तन उपयोग में लिए जाएँगे। मुझे तो अपने बड़ों (अर्थात्‌ आप) का अनुकरण करना ही पड़ेंगा।

सास चौंक कर बोली- तो क्या तुम मुझे भी इन्हीं खपड़ों में खिलाया कराोगी।

बहू- इसमें चोकने की क्‍या बात है मांजी! जैसी इस घर की परम्परा है , उसे तो निभाना ही होगा।

सास का दिमाग चकरा गया। रात को उसने स्वप्न देखा कि वह बूढ़ी हो गई है ओर उसी गन्दी पुरानी चारपाई पर पड़ी मिटटी के बर्तनो में खा रही हे। शीघ्र ही उसकी आँख खुल गई। फिर
सारी रात नींद नहीं आई।

प्रातः काल होते ही वो बूढी सास के पास गई और उसे पैरो में शीश रख कर रोने व क्षमा याचना करी अब तक जो हुआ सो हुआ, आगे से नहीं होगा मैने आपके साथ बडा अन्याय किया। अब तक जा हुआ, सो हुआ आगे से नहीं होगा। मुझे क्षमा कर दो।

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अब दीपावली का पर्व आया। धनतेरस के दिन सेठजी ने अपने मुनीम को घर भेजा की जाकर बहूजी से पूछे की धनतेरस पर क्‍या लिया जाए। बहु ने मुनीम जी से कहा की सोने के बर्तनो का एक सेट बनवादें। सैट आगया। सास ने देखा तो

पूछा- बहू इतना महँगा सेट क्‍यों मंगवाया? क्‍या कहीं विवाह में देना हे?

बहू ने कहा-‘ नहीं मॉजी! घर के लिए मंगवाया है। इसे प्रयोग में लाएँगे।’

सास-‘ लेकिन बेटा, इतने महँगे सैट की क्‍या जरूरत थी?’

बहू- जरूरत थी मॉँजी, तभी तो मँगाया। अब देखिए न मेरी सास अपनी सास को चॉँदी के बर्तनों में खिलाती है तो में अपनी सास को सोने के थाल में खिलाऊँगी।

यह उत्तर सुनकर सास ने बहू को गले से लगा लिया और कहा-बेटा! तूने मुझे ही नहीं सुधारा अपितु इस घर को भी स्वर्ग बना दिया। सच में तू धन्य है।

शिक्षा- हम जैसा व्यवहार करते हैं, वैसा ही प्रभाव हमारी संतान पर पड़ता है। यदि हम अपने से बडों का आदर नहीं करेंगे तो हमारी संतान हमारा भी आदर नहीं करेगी। मर्यादाओं पर ही कुटुम्ब, समाज और राष्ट्र टिकते हैं।

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