एक हाकी खिलाड़ी की अपनी कहानी

Ek haki khiladi ki kahani hindi mein मेरा नाम हरमीत सिंह है बात ओलंपिक खेलों की है जो सन 1972 में म्यूनिख में हुए थे भारत को सभी हॉकी मैचों में चार बार पेनल्टी स्ट्रोक का लाभ मिला मैं भारतीय टीम का कप्तान था मैंने चारों बार पेनल्टी स्ट्रोक का पूरा लाभ उठाया और विरोधी टीमों पर गोल किए म्यूनिख ओलंपिक में लोग मुझे पेनल्टी स्ट्रोक सम्राट कहने लगे।

अब यह पेनल्टी स्ट्रोक क्या है जब डी में रक्षक खिलाड़ी जानबूझकर विरोधी खिलाड़ी को गोल में गेंद हिट करने से रोके हाथापाई करें गोलकीपर या और कोई खिलाड़ी गेंद को दबा कर बैठ जाए या धक्का-मुक्की करें तो अंपायर रक्षक टीम के विरुद्ध आक्रामक टीम को पेनल्टी स्ट्रोक का लाभ देता है यह हिट गोल के बीचो-बीच से 8 गज की दूरी से मारी जाती है उस डी में केवल हिट लगाने वाला और सामने केवल गोलकीपर होता है।

कहने को यह बड़ा आसान लगता है कि हिट लगाया और गेंद गोल में किंतु गोलकीपर भी बहुत सावधान होते हैं।

सन 1973 में अम्सतरदम मैं भारत को चार पेनल्टी स्ट्रोक के अवसर मिले । किंतु भारत के खिलाड़ी एक का भी लाभ ना उठा सके यहां ना मेरी और ना गोविंदा की ही दाल गली यदि गोविंदा हालैंड के विरुद्ध अतिरिक्त समय में मिला पेनल्टी स्ट्रोक लगा पाते तो भारत विश्व चैंपियन होता।

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पेनल्टी स्ट्रोक लगाने वाला खिलाडी सूज भुज वाला देहरे बान और शान चित होना चाहिए मैं अहंकार नहीं करता परंतु लोग कहते हैं कि मुझ में यह बातें मौजूद है इसीलिए मुझे 1972 में म्यूनिख ओलंपिक में भारतीय टीम का कप्तान बनाया गया था।

मेरा जन्म गुजरावाला जो पाकिस्तान में है मैं 10 जून 1947 को हुआ था। अब मेरा परिवार फिरोजपुर पंजाब में बस चुका है मेरे पिता सरदार सोहन सिंह को खेलो हमसे बहुत प्रेम है हमारा कारोबार भी खेलों के सामान का है।

वैसे मैं सीमा सुरक्षा बल में इंस्पेक्टर के पद पर हूं मैंने डीएवी कॉलेज जालंधर से b.a. पास किया था हां कि मुझे विरासत में मिली है मेरे पिताजी हॉकी खेलते थे परंतु मुझे हॉकी खेलने की प्रेरणा अपने चाचा सरदार साहिब सिंह से मिली। वह पंजाब के प्रसिद्ध खिलाड़ी थे चार-पांच वर्षों तक उन्हें भारत की टीम में भी शामिल किया गया जो पहले लेफ्ट आउट खेलते थे बाद में उन्होंने सेंटर आफ खेलना शुरू किया था।

जब मैं नेहा की खेलना शुरू किया था तो सेंटर हाफ खेलना शुरू किया था अब मैं लेफ्ट हाफ खेलता हूं।लेफ्ट हाथ दाई ओर से विरोधी टीम के आक्रमण पर नियंत्रण रखता है और अपने अगुआ साथी खिलाड़ियों को पास देकर गेंद आगे बढ़ाने में सहायता करता है।

मैंने पहला अंतरराष्ट्रीय मैच सन 1966 में बैंकाक एशियाई खेलों में खेला था उन्हीं की तैयारी में मैंने लेफ्ट आफ का स्थान संभाला क्योंकि प्रशिक्षकों ने मुझे इस स्थान के अधिक अनुकूल समझा था।

सन 1966 से मैं लगातार अपने देश की टीम में खेल रहा हूं मेक्सिको ओलंपिक तथा म्यूनिख ओलंपिक के सिवा में बार्सिलोना तथा अमस्तरदम विश्व कप हॉकी प्रतियोगिता में भी खेला हूं। 

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इनके सिवा सन 1967 में पूर्व ओलंपिक्स में भी खेलने का अवसर मुझे मिला सन 1967 में श्रीलंका गई भारतीय टीम में भी मैं था।

खेल की लगन का कभी-कभी पढ़ाई पर भी असर पड़ता है मैं इंटरमीडिएट की परीक्षा में फेल हो गया था मैं आप सब को यह बात इसलिए बता रहा हूं कि खेल में पढ़ाई को भूलने से नुकसान अवश्य होता है।

अच्छा खिलाड़ी बनने के लिए मेहनत तो आवश्यक है ही आत्मविश्वास अपने ऊपर भरोसा उससे भी अधिक आवश्यक है आप सब खिलाड़ी बने खूब अभ्यास करें मेहनत करें और निरंतर मेहनत करते रहे चाहे कितने भी बड़े खिलाड़ी ना बन जाए।

मेरी कामना है कि अपने देश को हाकी के सर्वोच्च शिखर पर पोहचादुं।

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