इकलौता पुत्र । Moral Stories In Hindi । Hindi Moral Stories

Moral Stories In Hindi । Hindi Moral Stories

इकलौता पुत्र । Moral Stories In Hindi । Hindi Moral Stories

मधु प्रत्येक प्रकार से अपने नाम को सार्थक करती है । देखने में इतनी सुन्दर है कि लोग कहते हैं कि विधाता ने मधु को स्वयं सुन्दरता की प्रतिमा बनाया है। मधु के गुणों की सुगन्ध सारे सुन्दर
“नगर में फेली हुई है। मधु अपने पति प्रीतपालसिंह के साथ सुख से जीवन व्यतीत करती थी। प्रीतपालसिंह पुलिस में थानेदार थे।

वे कभी किसी से किसी प्रकार से भी कोई वस्तु लेना अपने धर्म के विरुद्ध समझते थे। अपने वेतन पर निर्वाह करते थे और आवश्यकता पड़ने पर दीन दुःखियों की सहायता भी करते थे। उनके लिये लोग कहा करते थे कि भगवान्‌ को प्रसन्न करने के लिये लोग पुष्प, धूप, दीप चढ़ाते हैं; परन्तु प्रीतपालसिंह को तो कोई पुष्प भी भेंट नहीं कर सकता।

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मथु के एक पुत्र-रत्र हुआ और वह अभी दो ही साल का था कि प्रीतपालसिंह की मृत्यु हो गई। प्रीतपालसिंह कोई धन छोड़कर न मरे थे। मधु बड़े संकट में थी । उसके कोई और भी सम्बन्धी नहीं थे, जिनके पास रहकर निर्वाह करती। धन का होना प्रसन्नता का कारण भले ही न हो, पर धन का अभाव दु:ख का कारण अवश्य बन जाता है।

मधु के पास धन का अभाव देखकर धनी लोगों ने सोचा कि अब तो वे धन के बल से मधु के साथ निन्दनीय और असहनीय अत्याचार करने में सफल हो सकेंगे! परन्तु मधु, मधु थी। वह साहस और वीरता से अपने दिन बिताने लगी और उसने किसी अत्याचारी को अपने प्रास न फकटने दिया।

उसने आवश्यक सामान तथा बर्तन कपड़े आदि रखकर सब सामान बेचकर अपने :पुत्र को पाला और अब वह पाँच वर्ष का हो गया। सिलाई की मशीन उसके पास थी। उसने बच्चों और स्त्रियों के कपड़े सी कर अपना निर्वाह आरम्भ कर दिया और अपने पुत्र को पाठशाला में भरती कर दिया ।
एक दिन एक धनिक स्त्री बाजार से कपड़े लेकर सिलवाने के “लिये मधु के पास बैठी थी। भूपेन्द्र पाठशाला का समय समाप्त होने पर घर पहुँचा।

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धनिक की. स्त्री बाजार से अपने बच्चों के लिये मिठाई भी लाई थी | उसने कुछ मिठाई निकाली और भूपेन्द्र को देनी ही चाही । मधु ने बड़े नम्न भाव से उसका धन्यवाद करके कहा कि मैं अपने बच्चे को यह मिठाई खाने को नहीं दे सकती हूँ। जैसा अन्न मनुष्य. खाता है वैसा ही उसका मन बन जाता है ओर वैसी ही उसकी बुद्धि बन जाती है । लोग दीपक जलाते हैं, दीपक काले रंग के अन्धकार को खाता है और काला काजल ही पैदा करता है ।

आंप बुरां न मानें बहिन जी, मुझे पता नहीं है कि आपका धन कैसा है। धन, सुख, शान्ति तथा सफलता का कारण केवल उन लोगों के लिये ही होता है जो. कठिन परिश्रम करके उससे अपना जीवन-यापन करते हैं ।

मैं भूपेन्द्र की बुद्धि को निर्मल रखना चाहती हूँ इसीलिये उसे किसी के घर की कोई वस्तु खाने को नहीं देती हूं। बेचारी धनवान्‌ स्त्री बड़े अचम्भे से मधु की ओर देखती रह गई। भूपेन्द्र भी बड़े परिश्रम से पढ़ता था और अब सातर्वी कक्षा में ‘पहुँच ग्रया था । वह खेल-कूद और पढ़ाई में सबसे आगे था। प्रत्येक परीक्षा में उसके नम्बर सबसे अधिक आते थे। वह यह अनुभव कर रहा था.कि वह निर्धन है और पढ़ाई का खर्च दिन-पर-दिन बढ़ता जाता था। उसने एक दिन अपनी माता मधु से कहा कि वह ऊँची- ऊँची शिक्षा प्राप्त करना चाहता है, पर माता पर बोझ नहीं बनना चाहता था।

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मधु ने भूपेन्द्र की बात का समर्थन करते हुए कह “बेटा ! मैं तुम्हें आशीर्वाद देती हूँ कि तुम सफल मनोरथ ही। संसाए में जो वस्तु असम्भव दीखती है, परिश्रम करने से वही सम्भव होजाती है। तुम्हारे अन्दर अपार शक्ति का भण्डार है। अपने को पहचानो और उस शक्ति से काम लो, फिर तुम अवश्य आग होगे।

तुम्हारी राह में अनेक प्रकार के प्रको भनरूपी काँटे आएँगे, उनमें मन न फँसाना | ईश्वर-विश्वास, सच्चाई और सच्चरित्रता के साथ अपने ध्येय पूर्ति में लगे रहना; बस, तुम सफल होगे।’ मधु की बात सुन भूपेन्द्र बोला, ““माता जी आपकी असीम“ कृपा के लिये कैसे धन्यवाद करूँ ? मैंने आपका दूध पिया है और मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि जीवन में किसी कार्य से भी आपके दूधको नहीं लजाऊँगा।”ये

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भूपेन्द्र की बात सुनकर मधु को बड़ा सन्तोष हुआ और उसने कहा कि संसार में किसी भी प्रकार की मेहनत मजदूरी करके कमाना कोई पाप नहीं है । यदि मजदूरी ईमानदारी पर निर्भर करती है
तो उस मजदूरी को करने वाला नीच नहीं हो सकता। वास्तव में नीच वे लोग हैं जो दूसरों की कमाई (धन) से मौज से उड़ाते हैं या ‘बरवाद करते हैं। महावीरसिंह भी तो एक निर्धन विद्यार्थी है, अब ‘कालिज में पढ़ता है।

उसने संब-कुछ अपने बल-बूते पर पंढ़ा है। ‘उसने कोई काम नहीं छोड़ा। पहले मजदूरी करता था: और फिर किताबों की जिल्द बाँधकर कमाने लगा, फिर जूतों पर पालिश करने की धुन लगी, फिर साइकिल ले ली और समाचार-पत्र बेचने लगा।

और अब, जब दसवीं में आया तो ट्यूशन करने लगा। दूसरे बच्चे तो अपने पंढ़ने को ट्यूशन रखते हैं और फिर भी फेल होते हैं | महावीर तो औरों को पढ़ाता रहा और आज तक कभी फेल नहीं हुआ । अब तो उसने प्रेस में कम्पोजीटर का काम सीख लिया है । बस कालेज से जो समय मिलता है सीधा प्रेस में जाकर काम करता है।..भूपेन्द्र ने अपनी माता की बात गाँठ बाँध ली । अपनी सुविधा के अनुसार मजदूरी करके पढ़ने लगा और इसी प्रकार पढ़कर एक बड़ा इंजीनियर बना और सरकारी नौकरी करने लंगा।

सरकारी इंजीनियर यदि चरित्र का धनी न हो तो ठेकेदार उसे भ्रष्ट कर देते हैं। भूपेन्द्र सिंह को कोई भी पथभ्रष्ट न कर सका। उसने मधु के दूध को अपने कार्य और चरित्र से कभी नहों लजाया।

शिक्षा-यदि लक्ष्य को सामने रखकर परिश्रम किया जाये तो सफलता अवश्य मिकती है।

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