राजा विक्रमादित्य कहानी मनुष्य मूल्य

राजा विक्रमादित्य की कथा

विक्रमादित्य एक न्यायप्रिये राजा थे उनके इंसाफ की प्रशंसा दूर-दूर तक फैली हुई थी वह बहुत विद्वान तथा विचारवान थे।

एक बार देवताओं के राजा इंद्र ने विक्रमादित्य की परीक्षा लेनी चाही इसके लिए उन्होंने मनुष्य के तीन कटे हुए सिर राजा के पास भेजें और कहलाया कि यदि राजा इन सुरों का मूल्य बता सकेंगे तो उनके राज्य में सब जगह सोने की वर्षा होगी यदि ना बता सके तो गाज गिरेगी और राज्य में मनुष्यों का भयंकर संघार होगा।

Raja vikramaditya ki kahani

राजा विक्रमादित्य ने तीनों सिर दरबार में रखवा दिए फिर होने दरबारी पंडितों से पूछा आप लोग इन चीजों का मूल्य बताइए।

परंतु कोई दरबारी उन शेरों का मूल्य ना बदला सका कारण यह था कि तीनों सिर्फ एक समान थे और एक ही मनुष्य के जान पड़ते थे उनमें राई के बराबर भी फर्क नहीं था।

सारे सभासद मोहन थे राज दरबार में सन्नाटा छाया हुआ था लोग एक-दूसरे का मुंह देख रहे थे पंडितों का यह हाल देखकर राजा चिंतित हुए उन्होंने पुरोहित को बुलाकर कहा तुम्हें 3 दिन की छुट्टी दी जाती है अगर तुम 3 दिन के अंदर इन सुरों का मूल्य बता सको गे तो मुंह मांगा इनाम दिया जाएगा नहीं तो कठोर दंड दिया जाएगा।

2 दिन तक रोहित जी ने बहुत सोचा परंतु वह किसी भी निश्चय पर ना पहुंचे तब तीसरा दिन शुरू हुआ तो वह बहुत व्याकुल हो उठे खाना पीना सब भूल गए चिंता के मारे चादर तान कर लेटे रहे।

पंडिताइन सेना रहा गया वह उनके पास आकर कहने लगी आज आप यूं कैसे पढ़े हैं चलिए उठिए नाहाइए खाइए।

पंडित ने उन तीनों नर मुंडो का सब किस्सा पंडिताइन को कह सुनाया सुनते ही पंडिताइन के होश हवास उड़ गए बड़े भारी संकट में पड़ गई मन में कहने लगी हे भगवान अब क्या करूं कहां जाऊं कुछ भी समझ में नहीं आता।

Raja vikramaditya hindi

पंडिताइन ने सोचा कि कल तो पंडित को कठोर दंड हो जाएगा तो मैं पहले ही क्यों ना प्राण त्याग दूं पंडित को अपनी आंखों के सामने हथकड़ी लगते या मौत की सजा होते देखने की बजाय मर जाना अच्छा है।

यह सोचकर पंडिताइन ने मरने की ठान ली और आधी रात के समय पंडिताइन शहर से बाहर तालाब की ओर चली।

इधर पार्वती ने भगवान शंकर से कहा एक सती के ऊपर संकट आ पड़ा है कुछ करना चाहिए।

शंकर भगवान ने कहा पार्वती यह तो संसार है यहां तो यह सब होता ही रहता है तुम किस किस की चिंता करोगी?

पार्वती हर्ट करने लगी और बोली कोई ना कोई उपाय तो करना ही होगा।

शंकर भगवान ने कहा यदि तुम नहीं मानती हो तो चलो।

शंकर पार्वती तालाब की मेड पर पहुंचे जहां पंडिताइन तालाब में डूबकर मरने आई थी पंडिताइन जब मेंड के पास पहुंची तो उसने झुरमुट में से बातचीत की आवाज सुनी शंकर ने कहा पार्वती इंद्र ने राजा विक्रमादित्य के यहां 3 सिर भेजे हैं और शर्त यह रखी है कि अगर राजा उनका मूल्य बता देगा तो राज्य भर में सोना बरसेगा और यदि ना बता सका तो गाज गिरेगी।

तो सुनो पार्वती शेरों का मूल्य तीनों सिरों में एक शेर तो ऐसा है यदि सोने की सिलाई लेकर उसके कानों में डालें और चारों ओर हिलाने डुलाने से सिलाई मुंह से ना निकले तो वह अमूल्य है।

दूसरे सिर में यदि सिलाई डालकर चारों और हिलाने डुलाने से यदि मुंह से निकल आए तो उसका मूल्य ₹10000 है।

तीसरा सिर लेकर यदि उसके कान में सिलाई डालने से यदि वह मुंह नाक आंख सब जगह से पार हो जाए तो उसका मूल्य दो कौड़ी है।

पंडिताइन यह सब सुन रही थी चुपचाप दबे पांव घर की ओर चल पड़ी वहां पंडित जी अब भी चादर ओढ़े चिंता में डूबे पड़े थे पंडिताइन ने चादर हटाई और कहा पड़े पड़े क्या कर रहे हो चलो उठो नहाओ खाओ क्यों व्यर्थ चिंता करते हो मैं उन तीनों हीरो का मूल्य बताऊंगी।

Raja veer vikramajeet ki kahani hindi mai

तीसरे दिन पंडित जी आराम से नहाए धोए फिर पूजा पाठ के बाद उन्होंने भोजन किया फिर पंडिताइन से भेद पूछकर वे राज दरबार में पहुंचे और राजा विक्रमादित्य से उन्होंने कहा महाराज मंगवाए वे तीनों सिर कहां है?

और इधर-उधर उलट-पुलट कर देखा और कहा एक सोने की सलाई मंगवा दीजिए।

फिर क्या था सोने की सलाई मंगवाई गई पंडित जी ने एक सिर उठाकर उसके कान में सलाई डाली चारों और हिलाई जुलाई पर वह सलाई कहीं से भी ना निकली पंडित जी ने कहा यह मनुष्य बहुत गंभीर है इसका भेद नहीं मिलता महाराज यह सिर अमूल्य है इसकी कीमत नहीं लगाई जा सकती।

फिर दूसरा सिर उठाकर पंडित जी ने उसके कान में सलाई डाली जब हिलाई डोलाई तो सलाई उसके मुंह से निकल आई पंडित जी बोले महाराज है मनुष्य कान का कुछ कच्चा है तो कान से सुनता है वह मुंह से कह डालता है इसका मूल्य ₹10000 है।

इसके बाद पंडित जी ने तीसरा सिर उठाया उसके कान में सलाई डालने पर मुंह नाक कान सभी जगह से सलाई पार हो गई पंडित जी ने मुंह बनाकर कहा महाराज यह मनुष्य किसी काम का नहीं है कोई भेद नहीं छुपा सकता इसका मूल्य दो कौड़ी है यह कान का कच्चा और चुगलखोर है।

पंडित जी का उत्तर सुनकर राजा विक्रमादित्य महाराज बहुत प्रसन्न हुए उन्होंने पंडित जी को सोना तथा हीरे जवाहरात पुरस्कार में दिए और तीनों सिर उत्तर सहित इंद्र को भिजवा दिए।

raja veer vikramajeet ki ये कहानी कैसी लगी कमेंट में बताइये

Leave a Comment

%d bloggers like this: