विद्यार्थी और साहस hindi stories

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विद्यार्थी और साहस सफलता को प्राप्त करने के लिये बहुत सी बातें आवश्यक हैं । परन्तु यदि ध्यानपूर्वक विचार करो तो कहना पड़ेगा कि सफलता के लिये साहस की अत्यन्त आवश्यकता है। प्रश्न उठता है कि एक डाकू भी साहस करता है, दूसरे को मारकर उसका धन हरकर ले जाता है। दूसरे व्यक्ति को देखिये वह भी साहस करके राह चलती स्‍त्री के गले में से सोने की माला उतारकर ले भागता है। परन्तु साहस से मेरा आशय उस साहस का है जिससे आचार, विचार, न्यायाचार और धर्मत्व की भावनाओं को ठेस न पहुँचे | दुराचारी जब ‘साहस करता है तो उसमें आचार, विचार और धर्म की भावना नहीं होती ।

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विद्यार्थी और साहस hindi stories

किसी धार्मिक और नीति के ग्रन्थ का स्वाध्याय करो तो एक बात पढ़ने को मिलती है कि यह जीवन एक संघर्ष है। जब जीवन ही संघर्ष है तो याद रखिये कि जीवन में सफलता प्रात करने के लिये
साहस की आवश्यकता है| लड़ाई के मैदान में एक सिपाही है | वह बड़ा योद्धा है। अनेक प्रकार अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हो, रणक्षेत्र को तरफ जाता है परन्तु वह साहस से हीन है।

आप बताइये वह कैसे सफलता प्राप्त करेगा ? जीवन-संघर्ष में सफल होने के लिये शारीरिक बल भी आवश्यक है। मानसिक शक्ति और ज्ञान की आवश्यकता है परन्तु इन सबके होते हुए भी यदि साहस नहीं तो सफलता कदापि नहीं मिल सकती।..

… मैंने आपको जताया कि विद्यार्थी में साहस होना चाहिये परन्तु आचार, विचार, नीति और धर्म की भावना से युक्त साहस होना अच्छा है । जगदीशं बड़ा लम्बा-चौड़ा और बलवान्‌ विद्यार्थी है। दो
मित्रों के साथ जा रहा है । उन्होंने पान की दुकान से सिगरेट ली और कहा, लो भाई, जरा दम लगाओ । जगदीश में नीतिपूर्वक साहस नहीं है । वह उनको “नहीं ‘ में उत्तर न देकर सिगरेट पीना आरम्भ कर देता है।

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दूसरे दिन जगदीश का मित्र महेश भी साथ हो जाता है। महेश बड़ा दुबला पतला है। साथी उसे सींकिया पहलवान के नाम से पुकारते हैं। सिगरेट की दुकान पर पहुँच कर उन्होंने सिगरेट ली, महेश को भी दी और. कहा, अरे लो सींकिया पहलवान, आप भी दम लगाओ जरा। महेश सींकिया पहलवान तो अवश्य है, परन्तु धर्माचरण-युक्त साहस का बल उसमें है। वह तुरन्त जगदीश को डॉटता है। दूसरे दोनों खाथियों को बुरा-भला कहता है।

उसे इस बात का भय नहीं है कि वे सब शरीर में बलवान्‌ हैं, क्रोधित होंगे तो उसकी चटनी बना देंगे अथवा कोई झूठा आरोप लगाकर उसे बदनाम करेंगे। महेश तो चट्टान की तरह खड़ा है और इसे ही मैं कहता हूँ साहस।

. विद्यार्थी-जीवन बड़ा कठिन जीवन है । स्वार्थी छोग यह जानते हैं कि विद्यार्थी में अनुभव की कमी है और इसलिए वह प्रत्येक की बात पर विश्वास कर लेता है। उसकी इस पवित्र भावना से अनुचित लाभ उठाने के लिये छोटे-बड़े सभी तरह के अत्याचारी, गुण्डे और बदमाश लोग विद्यार्थी को अपने जाल में फँसाने को सदा सोचते रहते हैं | अनेक प्रकार के प्रकोभन देते हैं, मीठी-मीठी बातें करके फुसलाते रहते हैं और अनेक प्रकार के यत्न करके विद्यार्थी को पददलित करना चाहते हैं|

यदि विद्यार्थी के पास धर्मांचरण-युक्त साहस नहीं है तो वह इन स्वार्थी लोगों की बातों को मानकर अपने जीवन को नष्ट कर बैठता है और यदि उसके पास साहस रूपी बल है तो वह उनके पंजे
में नहीं फंस सकता । जब विद्यार्थी साहस से काम लेकर दुष्टजनों के फन्दे से अपने आपको बचा लेता है तो वे दुष्ट लोग उसे कई प्रकार से बदनाम करके दु:ख देने का यत्र करते हैं। परन्तु साहसी विद्यार्थी यही सोचता है कि ये दुष्ट मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते ।

इसी प्रकार जब किसी विद्यार्थी को कोई भी बुरा कार्य करने को कोई मजबूर करे तो उसे सोचना चाहिये कि अन्त में इस कार्य को करने में शर्म उठानी ही पड़ेगी। नीतिपूर्वक साहस का बल उसे वैसा नहीं करने देता।

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परीक्षा के हाल में बैठे हैं। उसका साथी पीछे से वाधित कर रहा है कि वह उसे कुछ बतावे। परन्तु वह ऐसा नहीं करता है। परीक्षा हाल में से निकल कर उसे भला–बुरा कहा जाता है, परन्तु ये बातें उसे सच्चे मार्ग से डिगा नहीं सकती हैं। साहसी विद्यार्थी अपने ऊपर भरोसा करता है और वह सरे की सहायता पर निर्भर नहीं है–

भले ही वह फेल हो जाए। राधेलाल एक विद्यार्थी है। देखने में बड़ा सुडौल है। पढ़ने में बहुत परिश्रमी है, चाहे कुछ सुन लो सब याद है । किसी अत्याचारी लड़के ने उसे तंग किया है और मुख्याध्यापक से शिकायत करना चाहता है। कमरे के बाहर खड़ा है। न जाने मन में क्या विचार आ रहे हैं।

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मुख्याध्यापक बड़े सज्जन पुरुष हैं। प्रत्येक बालक का बड़ा आदर करते हैं और बालक को ही देश का सर्वोत्तम धन मानते हैं। परन्तु यह सब कुछ जानते हुए भी राधे कमरे के बाहर खड़ा है। भला क्यो ? क्योंकि उसके पास साहस की कमी है और साहस नहीं तो सब बातें निरर्थक हैं। विद्यार्थ-जीवन में और उसके पश्चात्‌ भी साहस की कमी मनुष्य को पंगु बना देती है। यह कहूँगा, वह कहूँगा और वैसे करूँगा आदि-आदि। परन्तु जब समय आता है और अध्यापक कुछ पूछते हैं तो ‘गूँगे का गुड़’ की कहावत चरितार्थ होती है। अर्थात्‌ गूँगा गुड़ का स्वाद बता नहीं सकता। बस वही हाल’ है’ उसका भी’।

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शिक्षा–मेरे प्यारे विद्यार्थियों ! आपके जीवन में पग-पग पर ऐसी समस्याएँ आती हैं जहाँ धर्मयुक्त साहस की आवश्यकता होती है । यदि आप सिर ऊँचा करके स्वाभिमान- पूर्वक जीवन को बिताना
चाहते हैं तो आपको उचित है कि साहस से काम लें और तभी आप प्रत्येक प्रकार के अनाचार-अत्याचार और दुराचार से अपने को सुरक्षित रख सकेंगे।

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