शेखचिल्ली की कल्पना – Shekh Chilli Ki Kahani

Shekh Chilli Ki Kahani

एक शेखचिल्ली साहब एक स्टेशन पर रहा करते थे। एक दिन एक मियाँजी रेल से एक राब की गगरी लेकर उतरे और शेखचिल्ली से कहा-“अबे इस घडे को शहर ले चलेगा?”

शेखचिल्ली ने कहा-“ हाँ हुजूर। ” मियाँ ने कहा-“दो पैसे मिलेंगे। ” शेखचिल्ली ने कहा-“ दो ही देना।” मियाँ ने शेखचिल्ली के सिर. पर घड़ा रखवा कर आगे-आगे स्वयं ओर पीछे-पीछे शेखचिल्ली चले।

Shekh Chilli Ki Kahani In Hindi

अब शेखचिल्ली की मनसूबेबाजी देखिए। शेखचिल्ली सोचता है-“इस घड़े को शहर में रखवाई मुझे दो पैसे मिलेंगे। उन दो पैसों की एक मुर्गी लूँगा। जब मुर्गी के अण्डे-बच्चे होंगे, तो उन्हें बेचकर बकरी लूँगा।

जब बकरी के कच्चे बच्चे होंगे, तो उन्हें बेचकर गौ लँगा। जब गऊ के बछडे होंगे, तो उन्हें बेच एक भैंस लूँगा। जब भैंस के बच्चे होंगे, तो उन्हें बेचकर ब्याह करूँगा।

फिर मेरे भी बाल-बच्चे होंगे, और वे बच्चे मुझसे कहेंगे कि बापू हमको फलां चीज ले दो, हम कहेंगे-धुत्‌ बदमाश।” इस शब्द के जोर से कहने से सिर से घड़ा गिर गया और गिरकर फूट गया।

यह देख मियाँजी बोले-“अबे तूने यह क्‍या किया; घडा क्‍यों फोड़ दिया?” शेखचिल्ली ने कहा-“ अजी मियाँ, आपको तो घडे की पड़ी है, यहाँ तो बसा-बसाया घर ही उजड़ गया।”

शिक्षा-व्यर्थ की कल्पनाओं से बचो। कल्पनाएँ मनुष्य को मानसिक रोगी. बनाती हैं।

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