वन कन्या की कहानी van kanya kahani

वन कन्या की कहानी

वन कन्या की कहानी जंगल की कहानी हिमालय पर्वत में एक घना वन था उस वन में एक सुंदर ताल था उस काल में एक वनकन्या रहती थी वह वनकन्या परी जैसी सुंदर थी उसका नाम था सुलक्षणा।

वन में कौन कोसो तक मनुष्य का नाम ना था फ्योली बस अकेली थी उसके पास केवल 1 के पक्षी और जीव-जंतु रहा करते थे उसके प्यार से पाले हुए भाई-बहन जैसे थे।

शिवली उन सबकी अपनी जैसी थी जब फैमिली गीत गाती तो हिरणी अपने को भूल जाती थी फूल सुलक्षणा को घेरकर खिलाते हंसते थे। हरी हरी दूब उसके पैरों के नीचे बिछ जाती थी जब भोर होती तो पंछी चाहे चाहकर सुलक्षणा को जगाते थे सभी उसे प्यारे थे वह सबकी प्यारी थी।

सुलक्षणा हर समय प्रसन्न रहती थी सुंदर भी बहुत ही उसके मुखड़े में चांद उतर आया था उसके गालों में गुलाब खिले थे उसके बालों में घटाएं गिरी थी।

सुलक्षणा निर्भय होकर वनों में घूमती वृक्षों के नए पत्ते बिछाकर कुंजो में लेट थी पंछियों के कलरव में अपना सुर मिलाती वह फूलों की माला और गजरे बनाती उन्हें अपने बालों में और बाहों में सजा लेती फिर नदियों की कलकल के साथ नाचा करती वह अकेली होते हुए भी अकेली ना थी क्योंकि वन के पशु पक्षी पेड़ पौधे कलियां और भोरे उसके संगी साथी थे।

एक दिन वह झर झर बहते पहाड़ी झरने के किनारे एक बड़े पत्थर का सहारा लिए बैठी थी वह जल में पैर डालकर एक हिरण के बच्चे को दुलार प्यार कर रही थी उसकी आंखें जल की उठती तरंगों पर टिकी हुई थी उसका मन ना जाने क्यों आप ही आप मुस्कुरा रहा था।

तभी किसी के आने की आहट हुई हिरनी का बच्चा डर कर चौंक उठा सुलक्षणा ने मुड़कर देखा तो सामने एक राजकुमार खड़ा था वह कमल के फूल जैसा कोमल और हिमालय की बर्फ जैसा गोरा था।

राजकुमार को देखकर सुलक्षणा छुईमुई सी शर्मा गई राजकुमार प्यासा था परंतु लक्षणों को देखते ही वह पानी पीना भूल गया सुलक्षणा एक और सरक गई राजकुमार अंजलि से पानी पीने लगा वह पानी पी चुका तो सुलक्षणा ने कहा शिकार करने आए हो।

राजकुमार ने कहा हां! सुलक्षणा ने कहा तो आप चले जाइए यहां मैं रहती हूं सब पशु-पक्षी मेरे भाई बहन हैं यहां कोई किसी को नहीं मारता सभी एक दूसरे को प्यार से गले लगाते हैं राजकुमार ने हंसकर कहा मैं भी किसी को नहीं मारूंगा यहां खेल-खेल में चला आया था कोई शिकार ना मिला और ना अब शिकार करने की इच्छा है इतनी दूर भटक गया हूं कि।

राजकुमार चुप हो गया सुलक्षणा भी चुप रहे उसने आंखों की कोरों से एक बार फिर राजकुमार को देखा वह सोच ना सके कि आगे राजकुमार से क्या कहें वैसे राजकुमार उसे अच्छा लगा कहने लगी आप थके मालूम होते हैं आराम कर लीजिए राजकुमार एक पत्थर की शिला पर बैठ गया संध्या होने लगी थी आकाश लाल हुआ गो स्लो को लूटते हुए पंछियों के मधुर स्वर सेवन गूंज उठा पशु भी अपनी-अपनी को कंधा और झुरमुट में लौटने लगे।

देखते ही देखते सुलक्षणा के सामने कंदमूल और जंगली फलों का ढेर लग गया रोज ही ऐसा होता था वन के पशु पक्षी सुलक्षणा के भाई-बहन उसके लिए फल फूल लेकर आते थे वह उन सब की रानी जो थी।

राजकुमार नहीं है देख कर कहा वनदेवी तुम धन्य हो इतना सुख है यहां इतना अपनापन है काश मैं यहां रह पाता।

सुलक्षणा नेटवर्क ते हुए का बड़ो के मुंह से यह छोटी बातें शोभा नहीं देती तुम यहां रह कर क्या करोगे राजकुमार को वनों से क्या वास्ता उन्हें तो महल चाहिए बड़े-बड़े शहर चाहिए जहां उन्हें राज करना होता है।

राजकुमार ने कहा जंगल में ही मंगल है तुम भी तो राज ही कर रही हो यहां।

सुलक्षणा मुस्कुरा उठी।

अंधेरा हो चुका था सुलक्षणा ने राजकुमार को बहुत से फूल भेंट किए फिर वह अपनी गुफा में चली गई राजकुमार वहीं पेड़ के नीचे लेट गया।

सुनहरा प्रभात हुआ चिड़िया क्या चेचहाने लगी राजकुमार जाट पड़ा उसे घर का ध्यान आया वह उदास हो गया परंतु यहां से जाने को भी उसका जी नहीं कर रहा था सवेरे सुलक्षणा कलेवा लेकर आई राजकुमार अपनी बात ना रोक सका बोला एक बात कहनी है सुनो गी।

सुलक्षणा ने पूछा क्या?

राजकुमार कुछ जिसका फिर साहस करके बोला मेरे साथ चलोगी मैं महल में तुम्हें राज रानी बनाकर पुजंगा।

सुलक्षणा ने कहा नहीं रानी बनकर मैं क्या करूंगी राजकुमार बोला मैं तुम्हें प्यार करता हूं अब तुम्हारे बिना मुझे कुछ अच्छा नहीं लगेगा शायद मैं अब सुख से नहीं जी सकूं।

सुलक्षणा ने उत्तर दिया पर वहां यह वन यह पेड़ यह फूल यह नदियां और यह पक्षी नहीं होंगे।

राजकुमार ने कहा वहां इससे भी अच्छी अच्छी वस्तुएं हैं मेरे राज महल में तुम हर प्रकार से सुखी रहोगी यह वन में क्या रखा है।

सुलक्षणा ने कहा मनुष्य ने अपने लिए एक बनावटी जीवन बना रखा है उसे मैं सुख नहीं मानती।

राजकुमार इसका कोई उत्तर न दे सका सुलक्षणा ने सोचा इतनी सुंदरता इतना प्यार सचमुच मुझे शहर में कहां मिलेगा इतनी शांति कहां मिलेगी।

फिर भी सुलक्षणा के मन में बैठा कोई कह रहा था सुलक्षणा हां कर दे।

सुरक्षा ने हां कर दी उसने फूलों के गहने पहने पशु पक्षियों और पेड़ पौधों से विदा ली चलते समय उसकी आंखों में आंसू थे जो मोतियों की तरह गिर रही थे।

सुलक्षणा को लेकर राजकुमार अपने राज्य में पहुंचा राज्य में सभी प्रसन्न हुए सुलक्षणा अब रानी थी राजकुमार उसे प्राणों से अधिक प्यार करता था राज महल में किसी चीज की कमी ना थी उत्तम उत्तम भारती भारती के भजन बढ़िया से बढ़िया वस्त्र और कहने सेवा करने के लिए दासिया और दिल बहलाने के लिए नृत्य किया इसके सिवा सुलक्षणा का सब सम्मान करते थे।

दिन बीतते गए सुबह का सूरज शाम को ढलता रहा उधर कुछ दिन पशु पक्षी पेड़ पौधे कलियां और फूल सुलक्षणा को याद करते रहे व्याकुल होते रहे परंतु धीरे-धीरे वे अपने-अपने काम में लग गए।

अचानक एक दिन सुलक्षणा को लगा जैसे उसके जीवन की उमंग हो गई है राज महल में हीरे मोतियों की चमक जरूर थी परंतु बहाना फूलों जैसा भोलापन था और ना पंछियों जैसी पवित्रता थी अब राज महल की दीवारें जैसे सुलक्षणा की सांस को गोटे दे रही थी।

सुलक्षणा को लगता जैसे वन उसे पुकार रहा है उसके भाई बहन उसे पुकार रहे हैं 1:00 का निर्मल प्यार उसे पुकार रहा है वह राज महल ओके डालो ईर्ष्या द्वेष से ऊब गई थी उसके लिए इस जीवन में कोई रचना रह गया था।

सुलक्षणा उदास रहने लगी है अकेली बैठी कुछ ना कुछ सोचा करती थी राजकुमार ने उसे प्रसन्न रखने के लिए लाखों पर्यटन किए परंतु सुलक्षणा का कुम्हलाया मन हराना हो सका कुछ ही दिन में वह बीमार होकर बिस्तर पर पड़ गई।

दिनोंदिन सुलक्षणा का मुखड़ा पीला पड़ता गया वह मुरझा गई उसकी जीने की आशा कम रह गई।

1 दिन सुलक्षणा ने राजकुमार से कहा मैं अब जिऊंगी नहीं मेरे एक अंतिम इच्छा है पूरी करोगे।

राजकुमार ने कहा अवश्य।

सुलक्षणा ने कहा कभी अगर शिकार को जाओ तो मेरे वनवासी उन भाई बहनों को मत मारना और जब मैं मर जाऊं तो मुझे पहाड़ की ऊंची चोटी पर गाड़ देना जहां भी रहते हैं।

इतना कहते-कहते सुलक्षणा के प्राण पखेरू उड़ गए राजकुमार ने उसी पहाड़ की चोटी पर उसे गाड़ कर उसकी अंतिम इच्छा पूरी की वन के पशु पक्षियों ने सुलक्षणा के भाई बहनों ने यह देखा तो वह बहुत दुखी हुए हवा ने सिसकी भरी फूल गिर पड़े कलियां मुरझा गई बेले मुरझा गई पंछी रो-रोकर आकाश को गुंजाने जाने लगे।

कुछ दिनों बाद पहाड़ की चोटी पर जहां सुलक्षणा गाड़ दी गई थी वहां एक पौधा उग आया उस पर एक सुंदर सा फूल खिला लोग उसे फ्युली कहने लगे पहाड़ की चोटी पर सीढ़ी नुमा खेत होते हैं उन खेतों की मेड पर एक पीला सा फूल होता है वही है फ्यूली।

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