विद्यार्थी की भावना Bachchon Ki Kahaniyan Hindi Mein

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जिसकी जैसी भावना होती हे उसको सिद्धि भी वैसी ही होती है। आजकल संसार के जिन देशों ने उन्नति न“ की है, उन सबके इतिहास को देखने से ज्ञात होता है कि वह उन्नति उस देश के विद्यार्थियों ने ही की है। अब से ६० वर्ष पूर्व की बात है कि जापान देश बहुत अनवत देश माना जाता था,

वहाँ न तो कोई कौशल था और न विद्या । उस समय देश की ऐसी दुर्दशा देखकर वहाँ के विद्यार्थियों ने संकल्प ‘ किया कि हम अपने जीवनकाल में ही जापान की रूपरेखा बदल डालेंगे। इस शुभ संकल्प को लेकर केवल ५० ही विद्यार्थी अपने देश से निकले | वे सब देशों में अनेक कष्ट सहकर अपने संकल्प पर दृढ़ हो गये, और उन-उन देशों के कला-कौशल का ज्ञान प्राप्त करके जापान लौटे । फिर उन्होंने ५० वर्ष के अन्दर ही सारी दुनिया की अपेक्षा अपना देश अधिक उन्नति पर पहुँचा दिया।

एक वार एक भारतीय’साधु पुरुष जहाज द्वारा विदेशों की यात्रा करता. हुआ जापान पहुँचा | वहाँ उसकी खाद्य सामग्री समाप्त हो गई, उसके पास कुछ जापानी छात्र आये और पूछने लगे,–श्रीमान्‌, आपको यहाँ कोई कष्ट तो नहीं है! उसने कहा–मेरे पास खाद्य- सामग्री कुछ भी नहीं है, जहाज में बनाया खाना मैं नहीं खाता । अब भूख मुझे सता रही है, इतना सुनते ही वहाँ के छात्रों ने सैकड़ों फल लाकर खाने के लिये उसे दिये,

और अनेक बार आग्रह करने पर भी उसका दाम न लिया और कहा कि आप यहाँ से जाकर किसी से न कहें कि जापानी जहाज में यात्रा करते हुये आपको कोई कष्ट हुआ | विद्यार्थियों | आप विचार करें कि अन्य देश के छात्र स्वदेश के प्रति कैसी उच्च भावना रखते हैं । ऐसे ही छात्रों से देश और समाज का हित होता है ।

कोई जापान का छात्र इंगलैंड में पढता था उस देश में गृहस्थ दूसरे देश के लोगों को अतिथि रूप से रखते हैं और उनकी पूरी सेवा करते हैं । यह जापानी छात्र भी ऐसे ही परिवार में रहा करता था, वह जब अपने किवाड़ बन्द करता था, तब वह किसी वस्तु को नमस्कार किया करता था। घर वालों ने अनेक वार देखा-कि यह किसी को नमस्कार करता है,

Bacchon Ki Kahaniyan Hindi Mein

एकदिन किसी को न देखकर उससे पूछा कि आप किसको नमस्कार करते हैं ? उसने कहा–कि यह मेरे देश की ध्वजा है । इस ध्वजा को नमस्कार इसलिये करता हूँ कि मुझ से कोई कार्य ऐसा न हो, जिससे मेरे देश की निन्‍्दा हो। जिन देशों के विद्यार्थियों की ऐसी उच्च- भावना होती है, वे देश उन्नति के उच्च- शिखर पर क्‍यों न चढ़ें !

यही कारण है कि अन्य देश नित्य ही नये आविष्कार करते हैं। आजकल अन्य देशों में ऐसा मनुष्य नहीं मिलता जो स्वदेश के गीत न जानता हो, और भारत भी 1947 में सवतंत्र हुआ था इतने वर्ष बीत गए, किन्तु यहाँ के विद्यार्थियों में ऐसी भावना लेशमात्र भी नहीं है ।

बड़े शोक की बात है कि हमारे छात्र-मण्डल की जबानों पर सिनेमाओं के गाने ही रहते हैं । भारतीय छात्रों को यह भी जानना चाहिये कि जिस पद पर आजकल हमारे प्रमुख नेता हैं, भविष्य में उस पद पर आज के छात्र ही होंगे। आजकल देश की जो-जो कुरीतियाँ हैं, उन सबका निवारण करना भी छात्रों का ही परम कर्त्तव्य है।

युवक ही देश के भावी कर्णधार हैं। इस समय हमारे देश में सत्यपूर्वक व्यवहार की बड़ी आवश्यकता है। उसके विना कोई वस्तु शुद्ध नहीं मिलती, और उससे भारतीय जनता की बड़ी हानि हो रही. है । देखिये, आजकल दूध, घी, तेल, शक्कर, आटा, दवाइयाँ आदि सब वस्तुएँ बिलकुल खराब मिलती हैं।

जब अन्य देश के विद्वान्‌ भारत की समस्याओं पर विचार करते हैं तो सब यही कहते हैं कि यदि स्वतन्त्र भारत भी अन्य देशों की समानता करना चाहता है तो भारत से अविद्या और असत्य व्यवहार को एकदम दूर करना होगा।

भारतीय विद्यार्थियों की दशा तो इस समय अत्यन्त शोचनीय हैं। वे केवल पोथे रटकर ही विना योग्यता के अपने को विद्वान्‌ समझकर अपने में कोई कमी नहीं मानते हैं | जानते हुए भी हठ के कारण नहीं मानते । इसीलिये उनकी उनत्ति तीनों कालों में भी नहीं हो सकती।

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शिक्षा—जंब तक छात्र गुणग्राही न बनें, ब्रह्मचर्यपालन न करें और उपर्युक्त बातों पर विचार न करें, और उनकी दृढ़ प्रतिज्ञा न हो, तब तक हमारा विश्वास है कि उच्नति किसी प्रकार भी नहीं होगी ।

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